I N Jha, Delhi

मेरी कहानी बहुत ही संघर्ष पूर्ण रही है | मैं 1994 में ग्रेजुएशन के एग्ज़ाम देने के बाद घर पर बैठा था कि मेरे मन में ख्याल आया कि जब तक रिज़ल्ट नहीं आ जाता तब तक घूमने के उद्देश्य से दिल्ली हो आता हूँ।

दिल्ली आने के बाद घूमने के लिए पैसे चाहिए थे तो मैंने सोचा किसी से उधार लेने के बजाय क्यों न कोई काम किया जाय, यही सोचकर मैंने एक क्राकरी की दुकान पर सलेसबॉय का काम करना शुरू कर दिया, वहां मेरी 1200 रुपए प्रतिमाह पर बात तय हुई, लेकिन चार दिन के बाद उस दुकान के मालिक ने मुझे झाड़ू लगाने को कहा तो मैंने मना कर दिया, इस पर वह बोला कि झाड़ू तो लगाना पड़ेगा यहाँ सब लगाते है। यह सुनकर मैंने नौकरी छोड़ दी और कोई दूसरी नौकरी ढूढ़ने लगा परन्तु मुझे कोई और नौकरी नहीं मिली तो मैं वापस अपने गाँव चला गया।

कुछ समय बाद मैं दुबारा दिल्ली आया और इस बार मुझे एक कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गयी| यहाँ मुझे 1800 रुपए महीना मिलता था परन्तु दो साल की नौकरी में मेरा 10 बार ट्रांसफर हुआ जिससे मैं परेशान हो गया। साथ ही इस सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी में मुझे बार-बार एहसास  भी होता था की ये जॉब कम पड़े लिखे लोगों के लिए है और मैं ग्रेजुएट होने के बावजूद ये जॉब कर रहा हूँ। मैं उस जॉब को छोड़कर फिर से नौकरी ढूँढने लगा लेकिन कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली। इसी क्रम में मुझे एक मार्किट रिसर्च एजेंसी में काम करने वाला आदमी (Santosh Jha) मिला जो एक जगह पर CLT कर रहा था, मैंने उससे इस काम और पैसों के बारे में पूछा तो उसने जो भी मुझे बताया मैं सुन कर संतुष्ट हो गया और अगले दिन मैं अपना रिज्यूमे लेकर उस एजेंसी में आ गया और मैंने वहाँ काम करना शुरू कर दिया। वहाँ काम करने वाले लोग बहुत ही दिलदार और सिखानेवाले प्रवृति के थे और उनके साथ मिलकर काम करते हुए मैंने एक साल में  बहुत कुछ सीखा, खासकर हाउसहोल्ड सेगमेंट में मै माहिर हो गया| लगभग एक साल में मैंने बहुत कुछ सीख़ लिया और अब मैं इंटरव्यूइंग के साथ साथ सुपरविज़न भी करने लगा। कुछ समय बाद उस एजेंसी के मालिक ने मुझे 4800 फिक्स्ड मंथली सैलरी पर परमानेंट एम्प्लोयी बनकर काम करने का प्रपोजल रखा जो मैंने मान लिया और काम करने लगा। वहां मैं हाउसहोल्ड सर्वे प्रोजेक्ट्स करने लगा। मैं पूरी निष्ठा से कंपनी की एक्सपेक्टेशंस के अनुसार काम करने लगा जिसके चलते मेरी सैलरी बढ़ाकर 5750 पर मंथ कर दी गयी।

फिर नवंबर 2000 में मार्किट एक्सेल एजेंसी का जन्म हुआ, हालाँकि मैंने यहाँ जून 2002 में जॉब ज्वाइन किया। मेरी शुरुआती मासिक आय 6500 रुपए थी। यहाँ के प्रमोटर्स के साथ काम करके मैं मार्किट रिसर्च का सारा काम आसानी से सीख गया, यहाँ का वातावरण  भी बहुत ही अच्छा है, सभी एक दूसरे के साथ कोआपरेट करते हैं जिससे हर प्रोजेक्ट आसानी से हो जाता है।

आज मैं हाउसहोल्ड के साथ साथ सेमि-कॉर्पोरेट और कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट्स भी करता हूँ। आप कह सकते है कि मैं क्वांटिटेटिव रिसर्च प्रोजेक्ट्स में माहिर हो गया हूँ और किसी भी तरह कि प्रोजेक्ट्स मैं आसानी से कर लेता हूँ। यहाँ मैंने जून 2002 से जुलाई 2009 तक इंटरव्यूइंग की, फिर मुझे प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर बना दिया गया। यहाँ मुझे सेन्सस प्रोजेक्ट करवाने के लिए अवार्ड भी दिया गया| इसी तरह मैं मार्किट एक्सेल में काम करते हुऐ इस सफर में आज एक इंटरव्यूअर से प्रोजेक्ट मैनेजर तक पंहुचा हूँ।

यहाँ हमने सीखा है कि जो भी काम करो उसे हमेशा क्वालिटी, निष्ठा और ईमानदारी के साथ करो। मुझे आशा है कि मैं आगे भी सफलतापूर्वक अपना काम जारी रखूँगा और मुझे फ़क्र है कि मैं मार्किट एक्सेल फैमिली का एक सदस्य हूँ।

I N Jha, Proud Family Member

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